लड़ाई पढ़ाई साथ साथ (in Hindi)

By बाबा मायाराम on March 21, 2016 in Learning and Education

(Ladaaee Padhaaee saath saath)

“पढ़ाई क्या होती है, हम नहीं जानते थे। एक बार मेरा दोस्त दुरला बीमार हो गया था तो उसने अपनी एवज् में अपने बड़े भाई रेवानिया को स्कूल भेज दिया था। ठीक उसी तरह जैसे परिवार में काम पर जाने वाला कोई व्यक्ति बीमार हो जाता था तो उसकी एवज् में घर के दूसरे आदमी को भेज देते हैं।”

यह घटना हाल ही मुझे भादल गांव के सुनील ने बताई जो दुरला के साथ ही पढ़ रहा था। यह भोलापन नहीं, पढ़ाई के बारे में अनभिज्ञता थी। जब मैं सुनील की बात सुन रहा था तब मुझे संविधान की याद आई जिसमें 1960 तक 14 साल तक हर बच्चे को मुफ्त शिक्षा का निर्देश दिया गया था। लेकिन आज भी इस लक्ष्य से हम बहुत दूर हैं।   

भादल गांव, महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले की अकरानी तहसील में है। यह गांव भी अन्य गांवों की तरह गुजरात में बन रहे सरदार सरोवर बांध से उजाड़ा गया है। इस गांव की नई बसाहट चीखली गांव में हुई है। यह अकेला गांव नहीं है, जहां पढ़ाई के बारे में लोगों को पता नहीं था।

कुछ साल पहले यह कहानी बहुत से गांवों की थी लेकिन अब तस्वीर बदल रही है।  नर्मदा बचाओ आंदोलन के साथ आदिवासियों ने मिलकर खुद के स्कूल शुरू किए हैं जिन्हें नर्मदा जीवनशाला के नाम से जाना जाता है।

मणिबेली स्थित जीवनशाला, फोटो अशीष कोठारी

पहले यहां के सरकारी स्कूल कागज पर चलते थे। शिक्षक सिर्फ 26 जनवरी और 15 अगस्त को ही झंडा फहराने आते थे। और हाजिरी रजिस्टर में छात्रों की हाजिरी लगाकर मोटा वेतन हासिल कर लेते थे। स्कूल ठीक से चलें, इसके लिए नर्मदा बचाओ आंदोलन ने बहुत कोशिश की। विकासखंड स्तर से लेकर जिला, प्रदेश और केन्द्रीय मंत्रियों तक गुहार लगाई गई लेकिन स्कूलों की हालत नहीं सुधरी।

आदिवासियों के कल्याण के लिए आजादी के बाद से बहुत सी योजनाएं बनीं। कार्यक्रम बने। पर आदिवासियों के हालात नहीं बदले। गरीबी तो बनी रही, शिक्षा की रोशनी भी अधिकांश लोगों तक नहीं पहुंची। आजादी के बाद से अब तक जितनी भी विकास के नाम पर योजनाएं बनीं उनमें सबसे ज्यादा आदिवासी और दलित ही उजड़े।

सरदार सरोवर बांध अकेले से ही 244 गांव प्रभावित हुए। एक नगर भी इसकी चपेट में आया है। गुजरात के बांध स्थल से पहाड़ी गांव भादल तक और उसके आगे करीब 70 आदिवासी गांव प्रभावित हुए हैं। उनकी घर,जमीन, खेती-बाड़ी सब डूबी है।

सतपुड़ा और विध्यांचल पहाड़ों के बीच बहने वाली नर्मदा के किनारे भील, भिलाला, पावड़ा, तड़वी आदिवासी रहते हैं, जिनकी आजीविका मुख्यतः जल, जंगल और जमीन पर ही निर्भर है। नर्मदा घाटी दुनिया की पुरानी संस्कृतियों में से एक है। घाटी में हरे-भरे जंगल और उनके साथ साथ आदिवासी, किसान, कारीगर, मछुआरे, कुम्हार, व्यापारियों तक सभी नर्मदा को नदीमाता मानते हैं।

नर्मदा कछार की जमीन सबसे ज्यादा उपजाऊ मानी जाती है। इसका साफ, निर्मला बहता जल और उसका अपूर्व सौंदर्य मोहता है। लेकिन इसके किनारे लोगों की जिंदगी और नर्मदा पर संकट तब आया जब सरदार सरोवर बांध बना और इन्हें उजाड़ा गया। सबसे पहले आदिवासियों को उजाड़ने की शुरूआत 1993 से हुई।

नर्मदा बचाओ आंदोलन ने घाटी में इसके खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी और संघर्ष का सिलसिला अब भी जारी है। हालांकि सरदार सरोवर बांध 139 मीटर तक बन चुका है। इससे कई गांव उजड़ चुके हैं। मैदानी क्षेत्रों में कई गांवों का कुछ हिस्सा डूबा है, पुनर्वास भी हुआ है लेकिन हजारों अब भी बाकी हैं। विस्थापन की अनेक दुख भरी कहानियां हैं। लेकिन संघर्ष के साथ निर्माण का काम भी होता रहा है। छत्तीसगढ़ के मशहूर मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी ने संघर्ष और निर्माण का रास्ता अपनाया था।

नियोगी ने नारा दिया था संघर्ष के लिए निर्माण, निर्माण के लिए संघर्ष। उन्होंने कहा कि  “ संघर्ष और निर्माण, दो पैरों की तरह हैं- इनमें से केवल एक के सहारे जो चलने की कोशिश करेगा, वह लड़खड़ा कर गिर पड़ेगा, दोनों के बीच तालमेल रखकर ही आगे बढ़ा जा सकता है।” नर्मदा बचाओ आंदोलन ने यही रास्ता अपनाया। नर्मदा घाटी में संघर्ष के साथ नवनिर्माण का काम भी हुआ।

नर्मदा बचाओ आंदोलन रैली बड़वानी, फोटो अशीष कोठारी

भूमि अधिकार के साथ साथ आंदोलन ने शिक्षा का सवाल भी उठाया। एक प्रतिशत से भी कम शिक्षितों का और महाराष्ट्र के पहाड़ी आदिवासी गांवों में कागज पर चल रही शालाओं का सवाल भी उठाया। धरना, रैली और प्रदर्शनों का सिलसिला चला। जांच हुई। लेकिन कुछ कार्रवाई के बाद स्कूल बंद ही रहे। 

आखिरकार, वर्ष 1992 में नर्मदा बचाओ आंदोलन के सत्याग्रह के दौरान पहली जीवनशाला चिमलखेड़ी में शुरू की गई। उस समय नर्मदा सत्याग्रह चल रहा था। डूबेंगे पर हटेंगे नहीं, के संकल्प के साथ लोग डटे रहे। नर्मदा परियोजना जो उन्हें डुबाने जा रही थी, के खिलाफ उनका सत्याग्रह जारी रहा। उस दौरान लोगों के पास काफी समय हुआ करता था, तो सत्याग्रह में मौजूद लोगों ने बिना पढ़े आदिवासियों को नाम लिखना व हस्ताक्षर करना सिखाया।

यह पढ़ाई-लिखाई नर्मदा की रेत में होती थी। अंगुली से या लकड़ी से  लिखना सिखाया जाता था।  इससे आदिवासियों में एक पढ़ने की रूचि जागी, जिससे आगे चलकर नर्मदा जीवनशाला खोलने का विचार बना।  आंदोलन के लोगों ने आदिवासियों के साथ तय किया कि गांवों में जीवनशाला खोली जाए। और चिमलखेड़ी गांव में पहली जीवनशाला शुरू हुई। यहां के निवासी आठया भाई ने इसके लिए जमीन दी, बुजुर्ग जुगला ने अन्य सहायता उपलब्ध कराई।

पिछले 23 सालों से महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में जीवनशालाएं चल रही हैं। वर्तमान में महाराष्ट्र में 7 और मध्यप्रदेश में 2 जीवनशालाएं हैं। यह आवासीय शालाएं हैं, जहां बच्चे रहते हैं और पढ़ते हैं। यहां पहली से चौथी/ पांचवीं तक की पढ़ाई ( राज्य नियमों के अनुसार) होती है। ये जीवनशालाएं ऐसे दूरस्थ, दुर्गम और पहाड़ी अंचलों में स्थित हैं, और जहां आजादी के बाद से शिक्षा की रोशनी नहीं पहुंची है। इन क्षेत्रों में न बिजली है और बहुतांश शालाओं तक न ही सड़क। स्वास्थ्य सुविधाएं की पहुंच भी नहीं है।

हाल ही में मुझे नर्मदा घाटी में जाने का मौका मिला। मैं वहां जीवनशाला के बाल मेला में गया था। बच्चों, शिक्षकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, ग्रामीण आदिवासियों से मिला। 4 से 7 फरवरी तक उनके साथ रहा। यह जीवनशाला का 17 वां बाल मेला था। इसका उद्घाटन 4 फरवरी को नंदुरबार के जिला कलेक्टर ने किया।

रंग-बिरंगी पोशाकों में बांसुरी की तान और ड्रम, झांझ और ढपली की मधुर थापों के बीच कलेक्टर ने फीता काटकर मेले की शुरूआत की। कलेक्टर ने अपने संक्षिप्त भाषण में जीवनशालाओं की सराहना की और कहा कि शासन भी चाहता है कि आदिवासी भाई-बहनों के बच्चे पढ़ें।

यहां करीब 500 छात्र आए थे। शिक्षक, पालक, अभिभावक और ग्रामीण बड़ी संख्या में एकत्र हुए थे। नंदुरबार में नेहरू पुतला के पास खेल मैदान में जमावड़ा लगा था। खेल मैदान में सुबह 9 बजे से ही खेल शुरू हो जाते थे और सूर्यास्त तक चलते थे। बीच में दोपहर भोजन की छुट्टी होती थी। खेल मैदान से डेढ़ किलोमीटर दूर बच्चों के रहने और खाने की व्यवस्था की गई थी। यहां बच्चे नारे लगाते हुए, ड्रम बजाते हुए खुशी व उत्साह से आते-जाते थे। उनके साथ शिक्षक होते थे। स्कूलों में बच्चों की देख-रेख करने वाली सहायिकाएं , जिन्हें वे मौसी कहते हैं, भी साथ होती थीं।

इन चार दिनों में मैंने इन बच्चों का जो कमाल देखा, वैसा मैंने कभी नहीं देखा। छोटे-छोटे बच्चों की खो- खो में लंबी छलांग, चीते की तरह दौड़ना, उछलना, कबड्डी में ताल ठोंकना और जीतने के लिए पूरी ताकत से खेलना। आज जब सैकड़ों किलोमीटर दूर बैठकर इन पंक्तियों को लिख रहा हूं, मेरी आंखों में वह दृश्य तैर रहे हैं, खेल का मैदान सजीव हो रहा है। 

कबड्डी और खो-खो की टीमें बहुत प्रशिक्षित थीं। खेल के शिक्षक बच्चों के साथ रहते थे और बच्चे ड्रम बजाकर उनका उत्साहवर्धन करते थे। खेल मैदान में इन बच्चों ने जिस तरह खेल कौशल का परिचय दिया, उसका कोई जोड़ नहीं है।

डनेल, थुवाणी, मणिबेली, त्रिशूल, सावरिया दीगर, भाबरी, भिताड़ा, खारय्या भादल और जीवन नगर आदि नर्मदा जीवनशालाओं के लड़के और लड़कियों की टीमें मैदान में उतरी थी। कबड्डी और खो-खो आकर्षण के केन्द्र थे। तीरकामठा की स्पर्धा भी हुई। इसके अलावा, यहां वैकल्पिक ऊर्जा से जुड़े सौलर लैम्प और नर्मदा की फोटो प्रदर्शनी भी लगाई गई थी। नर्मदा आंदोलन से जुड़ा साहित्य भी उपलब्ध था। मिट्टी की मूर्तियां और खिलौने, चित्रकला और निबंध प्रतियोगिताएं भी आयोजित की गईं थीं।

देर रात तक सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने समा बांधा। बच्चों ने गीत, नृत्य और नाटक पेश किए। नाटक बहुत ही अर्थपूर्ण और सार्थक थे जिनमें देश की कई ज्वलंत समस्याओं को उठाया गया। इसमें वीर खाज्या नायक, भीमा नायक और टंटिया भील जैसे आदिवासियों की कहानी बताई गई, इन सभी ने अंग्रेजों से कड़ी टक्कर ली थी। मुझे यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि इतनी कम उम्र में उनमें अच्छी समझदारी व मुद्दों को समझने की क्षमता विकसित हो गई है।

कार्यक्रम के अंतिम दिन प्रतियोगिताओं के प्रतिभागी टीमों व छात्र-छात्राओं को पुरस्कार वितरण किया गया। सबसे ज्यादा पुरस्कार डनेल और जीवननगर मिले। इन दोनों शालाओं ने अलग-अलग स्पर्धाओं में 14 पुरस्कार जीते। भाबरी जीवनशाला को 9, सावरिया दीगर को 8, मणिबेली को 7, त्रिशूल और भिताड़ा को 5-5 पुरस्कार मिले। 

बाल मेले की सबसे बड़ी उपलब्धि रही है उत्साह। हम सबके दिल  खेल और सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान झूम उठते थे। खेलों के दौरान लोग दम साधकर, जीत-हार की परवाह न करते हुए उनका उत्साहवर्धन करते थे। उत्साह की जो लहरें यहां उठ रही थी, वह नई पीढ़ी को संवारने का काम कर रही हैं।

बाल मेला से बच्चों को आपस में मिलने-जुलने और अपने खेल, कौशल और एक-दूसरे से सीखने का मौका मिलता है।  शहरी नागरिक, छात्र-छात्राएं, सामाजिक कार्यकर्ता, कलाकार, पत्रकार और खेल प्रेमियों ने खूब आनंद लिया।     

महाराष्ट्र के योगिनी, लतिका, चेतन, सियाराम, सुनील और युवा छात्र मध्यप्रदेश से भागीरथ, राहुल और जीवनशाला के शिक्षकों ने आयोजन की जिम्मेदारी संभाली। शिक्षकों ने बच्चों की टीमों को मैदान में उतारा और खेलकूद की भावना से मुकाबला करवाया। इसके अलावा, तलौदा के शिक्षक अपने महाविद्यालयीन छात्रों के साथ आए थे, जिन्होंने भी आयोजन व साफ- सफाई में मदद की।   

यहां जीवनशाला की पढ़ाई और दिनचर्या के बारे में बताना उचित होगा। यहां का मुख्य नारा है- जीवनशाला की क्या है बात, लड़ाई, पढ़ाई साथ-साथ। यह मूल मंत्र है। हर बच्चे की जुबान पर है। यहां के बच्चे सिर्फ स्कूल पढ़ते ही नहीं हैं, संघर्ष भी करते हैं। जब कभी भी आंदोलन का धरना, जुलूस, अनशन या सत्याग्रह होता है, तब उसमें शामिल होते हैं, जुलूस में आगे चलते हैं, नारे लगाते हैं। इन बच्चों का जन्म भी आंदोलन के माहौल में हुआ है। उसमें ये पले- बढ़े हुए हैं। जीवनशाला के शिक्षक उनके अपने बीच के हैं।

यहां की शुरूआती पढ़ाई यहां की पावरी और भिलाली में होती है।  स्थानीय भाषा, संस्कृति और जीवन पद्धति से जुड़ी होती है। शिक्षक बटेसिंह पावरा बताते हैं कि “हम अपनी स्थानीय भाषा में बच्चों को पढ़ाते हैं, जिससे वे जल्दी समझते हैं। हमने दो किताबें- स्थानीय भीली और पावरा में निकाली हैं- हमरा केनया ( हमारी कहानी), अक्षर ओलखान( अक्षर ज्ञान)। हमरा केनया में बुजुर्ग लोगों की मौखिक बताई कहानियां हैं। अक्षर ओलखान नामक किताब में बारहखड़ी है, जिसमें आसपास की चीजों से जोड़कर मात्रा ज्ञान कराया जता है। जैसे- क कमल का नहीं, क कुकड़ा का। हम जो पढ़ाते हैं वह जीवन और स्थानीय पर्यावरण से जुड़ा होता है, पर्यावरण बचाने का संदेश होता है। हम बच्चों को खेती के तौर-तरीके, आदिवासी मूर्ति कला, स्थानीय जड़ी-बूटी से इलाज और परंपरागत ज्ञान व स्थानीय इतिहास के बारे में पढ़ाते हैं। बच्चे खेती में मदद करते हैं। आंदोलन में शामिल होते हैं।”

सीताराम पाडवी, जो खुद जीवनशाला के पहले बैच के छात्र रहे हैं, अब नर्मदा बचाओ आंदोलन के सक्रिय कार्यकर्ता हैं और मछली सहकारिता का काम देखते हैं।  वे कहते हैं कि “ मैं आज जो कुछ भी हूं, जीवनशाला का उसमें बड़ा योगदान है।” जीवनशाला खुलने के बाद से इन स्कूलों से कई स्नातक और राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी निकले हैं। इनमें शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता, पुलिसकर्मी और नर्सिंग में छात्र-छात्राएं गए हैं। यह बहुत अनूठा, प्रेरणादायक, सराहनीय और अनुकरणीय काम है।

धनखेड़ी गांव आधे से अधिक डूब चुका है। फिर भी जिनका पुनर्वास नहीं हुआ है, वे परिवार आज भी अपने गांव में डटे हुए हैं। इनमें से ही एक हैं पारसी भाई। उनके दोनों बेटे भीमसिंह और गुलाबसिंह ने कई पुरस्कार जीते हैं। गुलाबसिंह को तो 17 स्वर्ण पदक व अन्य पदक मिले हैं। और वह महाराष्ट्र की युवा खिलाड़ी टीम का कप्तान बन गया है। दोनों को ओलंपिक के लिए तैयारी करना मुश्किल है, आर्थिक अभाव एक समस्या है।

2015 में पूरे नासिक विभाग से (चार जिलों से) क्रीडा प्रबोधिनी स्पर्धा में चुने गए दो ही छात्र थे- कमलेश पावरा और संदीप पाडवी। दोनों ही छात्रावास के विद्यार्थी हैं।

कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है वैकल्पिक शिक्षा का प्रयोग शासकीय स्कूलों से कई मायनों में अलग है। एक इसमें शुरूआती शिक्षा स्थानीय भाषा भीली व पावरी में दी जाती है, वह अपने स्थानीय परिवेश, जीवनशैली व पर्यावरण से जुड़ी होती है, जिससे बच्चे जल्द सीखते हैं। दो, स्कूली शिक्षक उनके अपने बीच के होते हैं, जो बच्चों व परिवेश दोनों से परिचित होते हैं, उनकी भाषा जानते हैं, इसलिए बच्चों को ठीक से सिखा पाते हैं और बच्चों को भी मजा आता है। तीसरी बात यह है कि यहां बच्चों में जानने की जिज्ञासा जगाई जाती है, प्रश्न पूछने पर जोर दिया जाता है, शायद इसलिए बच्चे इतने अच्छे नाटक कर पाते हैं, निबंध लिख पाते हैं। शिक्षा का उद्देश्य भी यही है जिज्ञासा जगाना। एक अच्छा इंसान बनाना।  

हालांकि सरकार ने इन नर्मदा जीवनशालाओं को  लंबे अरसे तक मान्यता नहीं दी। अब मान्यता मिली है, लेकिन कोई आर्थिक मदद नहीं। स्थानीय लोगों के सहयोग और नर्मदा नवनिर्माण अभियान ट्रस्ट और दान से इन शालाओं को चलाया जा रहा है। जिन परिस्थितियों में और संघर्ष में आजाद भारत में आदिवासियों की इस नई पीढ़ी को दीक्षित करने का काम हो रहा है, शिक्षा के क्षेत्र में अविस्मरणीय और प्रकाशस्तंभ के साथ चमकता रहेगा।

लेखक बाबा मायाराम के साथ संपर्क करें



Story Tags: alternative learning, alternative education, localisation, traditional agricultural techniques, tribal, tribal education, indigenous, organic learning

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