मजदूरों की अनूठी जनसुनवाई (in Hindi)

By बाबा मायाराम on Jan. 24, 2020 in Livelihoods

विकल्प संगम के लिये लिखा गया विशेष लेख (Specially written for Vikalp Sangam)

(Mazdooron ki Anoothee Jansunvaaee)

सभी फोटो अशीष कोठारी

राजस्थान के अजमेर जिले के ब्यावर में निर्माण मजदूरों की जनसुनवाई हो रही है। यह पिछले साल 5 अक्टूबर 2019 की बात है। बड़ी संख्या में मजदूर जमा हैं। वे शिकायत लेकर आए हैं। उनकी शिकायत सुनने के लिए यहां एक पैनल है जिसमें श्रम विभाग के उच्च अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार शामिल हैं।

भीम कस्बे के पास बड़ी का बाड़िया में स्थित लोकतंत्रशाला में हम सब ठहरे हुए थे। इस लोकतंत्र के स्कूल में युवाओं को लोकतंत्र व संविधान की जानकारी और प्रशिक्षण दिया जाता है। संविधान की प्रस्तावना ही यहां की प्रार्थना है।

हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न, समाजवादी , पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को :

सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा

उन सबमें व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढ़ाने के लिए

दृढ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई0 (मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, सम्वत् दो हजार छह विक्रमी) को एतदद्वारा

इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

देश भर के सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरण व किसान कार्यकर्ता, पत्रकार समेत हम सब लोकतंत्र पर विकल्प संगम की बैठक के लिए यहां पहुंचे थे। विकल्प संगम, देश भर में उभर रहे मौलिक विकल्पों की आपस में साझेदारी और भविष्य की परिकल्पना करने का एक मंच है। विकल्प संगम के पहले दिन ब्यावर में सामाजिक अंकेक्षण व जनसुनवाई आयोजित की गई थी। यह सूचना एवं रोजगार अधिकार अभियान और श्रम और रोजगार विभाग, राजस्थान के संयुक्त तत्वावधान में हुई। यह जनसुनवाई भी संगम का एक हिस्सा थी, जो पारदर्शी व जवाबदेह लोकतंत्र के लिए जरूरी है।

सुबह के करीब 7 बजे हम बस से ब्यावर के लिए चल पड़े। मध्य राजस्थान का यह इलाका सूखा है और यहां पेड़ पौधे बहुत कम हैं। यहां की खेती बारिश की है। रास्ते में हमने बाजरा के खेत देखे। उसके मोतियों से जड़े भुट्टे लुभा रहे थे। पत्थरों की दीवारों वाले घर, पानी भरी कुछ झीलें और तालाब भी थे। झील और तालाब देखकर नजरें टिकी रहीं। यहां के पहाड़ पूरे नंगे हैं, उजाड़ हैं, उनमें पत्थर ही पत्थर हैं। हरियाली के तौर पर विदेशी बबूल ही दिखता है, जो शायद ही किसी काम का हो।

जनसुनवाई में ग्रामीण महिला शिकायत रखते हुए

सुबह के करीब 10 बजे हैं। धूप तेज है, उमस है। मंच पर  हमारा पैसा, हमारा हिसाब के नारे गूंज रहे हैं। मजदूरों ने शिकायत बताना शुरू कर दिया है। यहां आई दादरबाड़ी बस्ती की रेखा ने बताया कि उनसे डायरी (संनिर्माण एवं कर्मकार मंडल में पंजीयन) बनवाने के लिए 600 रूपए लिए। यह पैसा ई मित्र जो मजदूरों की डायरी (पंजीयन) बनवाने के लिए आनलाइन आवेदन करता है, वह लेता है। इसी तरह कंजरबस्ती की आशा ने बताया कि उनसे डायरी बनवाने के लिए 1300 रूपए लिए। जबकि श्रम विभाग के अधिकारी ने बताया कि डायरी बनवाने के सिर्फ 85 रूपए लगते हैं।

इसी प्रकार, यहां कुछ महिलाओं ने बताया कि उनसे सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं के लिए घूस मांगी जाती है। अन्यथा उनके लिए कई कई दिन चक्कर काटने पड़ते हैं। इस तरह की शिकायत शारदा देवी, कमला, वंदना और नीना भाटी ने की।  

यहां मजदूर किसान शक्ति संगठन, हाल ही असंगठित क्षेत्र के विभिन्न ट्रेड के लिए बने राजस्थान असंगठित मजदूर यूनियन और सूचना वाम रोजगार अधिकार अभियान राजस्थान के बारे में जानना उचित होगा। ये तीनों ही संगठन इस अनूठी जनसुनवाई और सामाजिक अंकेक्षण (सोशल आडिट) की प्रक्रिया से जुड़े थे।

यूनियन की कहानी बाद की है, पर पहले इसी यूनियन के बारे में जानते हैं। मजदूर किसान शक्ति संगठन पहले से था, जिसकी पहल पर ही यूनियन बना। राजस्थान असंगठित मजदूर यूनियन का गठन करने का निर्णय 26 अक्टूबर 2017 को अजमेर जिले के जवाजा में लिया गया। अगले वर्ष जून 2018 को इसका पंजीयन हुआ। इसकी सोच शुरूआत में नरेगा (राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (नरेगा) को बाद में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) का नाम दिया गया)  मजदूरों के हक के लिए थी, पर बाद में सभी असंगठित मजदूर इसके दायरे में शामिल कर लिए गए।

यूनियन की राज्य इकाई के साथ प्रखंड इकाई भी होती है। पंचायत स्तर पर यूनियन के कार्यकर्ता होते हैं। इसमें 27 पंचायत स्तर के कार्यकर्ता हैं जिनमें 26 महिलाएं हैं, केवल एक पुरूष है। यूनियन में लगभग 4000 सदस्य हैं जिनमें अधिकांश महिलाएं हैं। यूनियन का कार्यक्षेत्र मुख्य रूप से राजस्थान के 4 जिलों में हैं जिनमें पाली, अजमेर, राजसमंद और भीलवाड़ा शामिल हैं। यूनियन का प्रधान कार्यालय देवडूंगरी (राजसमंद जिला) में है, जो मजदूर किसान शक्ति संगठन का भी कार्यालय है।

देश में 93 प्रतिशत मजदूर असंगठित क्षेत्र से हैं। जैसे ईँट भट्टे, कुआं खुदाई, होटल, छोटे कारखाने, नरेगा, खेतिहर मजदूर, रेहड़ी पटरी, हाथ ठेले पर सब्जी व फल बेचने का काम करते हैं। इन सभी के लिए यूनियन लड़ती है। यूनियन ने नरेगा के लिए निर्धारित 100 दिन का पूरा काम लिया है। उसकी पूरी मजदूरी भी ली है। अगर हम  देश के अन्य राज्यों को देखें तो यह बड़ी उपलब्धि है।

मजदूर किसान शक्ति संगठन की कहानी 80 के दशक के उत्तरार्ध में शुरू होती है। जब तीन सामाजिक कार्यकर्ता कुछ सार्थक काम करने की तलाश में देवडूंगरी गांव में रहने लग गए थे। देवडूंगरी गांव पहले उदयपुर जिले में था, फिर राजसमंद नया जिला बना, उसमें शामिल कर लिया गया। इनमें से एक थीं- अरूणा राय और दूसरे थे निखिल डे और तीसरे थे शंकर सिंह।  जब ये तीनों उस इलाके में घर की तलाश कर रहे थे तो शंकर सिंह की बहन ने उनका देवडूंगरी का घर इनको रहने के लिए दे दिया। अरूणा राय ने आइ.ए.एस. की नौकरी छोड़ी थी और निखिल डे अमरीका से लौटे एक आदर्शवादी युवा थे। शंकर सिंह स्थानीय थे और जीविका के लिए उन्होंने कई काम किए थे। शंकर सिंह के व्यक्तित्व की कई विशेषताएं हैं जिसमें लोकगीत, कठपुतली शो और नुक्कड़ नाटक शामिल हैं। वे लोगों से बहुत ही सहज सरल तरीके से जुड़ जाते हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता शंकर भाई गीत गाते हुए

इन लोगों ने गांव में रहते हुए गरीबी और जमीनी हकीकत करीब से देखी। खुद का जीवन भी बहुत साधारण व सादगीपूर्ण रखा। इन सबने तय किया कि वे कोई फंडिंग एजेंसी से पैसा नहीं लेंगे, गांव की तरह जीवन बिताएंगे और उनकी समस्याओं का गांव के लोगों के साथ मिलकर समाधान निकालने की कोशिश करेंगे। यह सिलसिला आज भी जारी है। सामाजिक कार्यकर्ता भी गांव के मजदूरों की तरह सिर्फ न्यूनतम मानदेय की राशि लेंगे। यह नियम आज भी सभी कार्यकर्ताओं के लिए है।

इस बीच 1 मई 1990 में भीम कस्बे में करीब हजार किसान और मजदूर एकत्र हुए और उन्होंने मजदूर किसान शक्ति संगठन का गठन किया। अब यह मजदूर दिवस का दिन इनके लिए एक त्यौहार की तरह है। हर वर्ष मजदूर दिवस बड़ी धूमधाम व उल्लास से मनाया जाता है। मजदूरों के हक व अधिकार के लिए लड़ने का संकल्प लिया जाता है।

90 के दशक की शुरूआत में इस इलाके में सूचना के अधिकार, रोजगार गारंटी और न्यूनतम मजदूरी के लिए आंदोलन  हुआ। न्यूनतम मजदूरी, मस्टर रोल, बिल, वाउचर और विकास खर्चों का ब्यौरा मांगा गया। क्योंकि शासकीय योजनाओं में भ्रष्टाचार और शोषण की शिकायतें आ रही थीं। पारदर्शी और जवाबदेही के लिए शासकीय रिकार्ड की मांग की जा रही थी, जिसे शासन इंकार कर रहा था।

इस आंदोलन से एक नारा निकला- हम जानेंगे, हम जिएंगे। यहां के लोग सोचते थे कि उनकी बुनियादी जरूरतों में और सरकारी दस्तावेजों, मजदूरी की हाजिरी वाले मस्टर रोल, बिल वाउचरों में सीधा संबंध है। उनमें हेर-फेर और शोषण का उनकी जिंदगी से सीधा जुड़ाव है। मोहन जी, जो एक दलित कार्यकर्ता थे, लोकगायक थे, उन्होंने एक गाना भी बनाया था कि

पहले वाले चोर भइया बंदूकों से मारते थे,

अभी वाले चोर तो कलमों से मारे रे, राज चोरों का।

अगर कागजों को लोगों के सामने रखा जाए, उजागर किया जाए तो वास्तविकता सामने आ जाएगी।

इसका एक अनोखा तरीका जनसुनवाई विकसित हुआ। इस जनसुनवाई में गरीब लोगों के बीच प्रशासन आया। गरीब लोग अन्य लोगों के सामने आकर बोलने लगे। इसका जोर राज्य सरकार की गैर जवाबदेही, पारदर्शिता का अभाव और लापरवाह प्रशासन जैसी कठोर सच सामने आने लगे । काम का अधिकार, सूचना का अधिकार और भोजन का अधिकार सभी एक तरह से गैरबराबरी और अन्याय को भी बताते हैं।

लोकतंत्र में कानून बनने की प्रक्रिया, कानून बनना, उसका क्रियान्वयन और सामाजिक अंकेक्षण में लोगों की भागीदारी जरूरी है। जानकारी, सुनवाई, कार्रवाई, भागीदारी और सुरक्षा। इसमें मजदूर किसान शक्ति संगठन ने छठवां बिन्दु जोड़ा खुले में जनसुनवाई। इसे भीलवाड़ा सिद्धांत के नाम से जाना जाता है। इसी तरह की जनसुनवाई ब्यावर में चल रही है।

सूचना के अधिकार ने नागरिकों और सरकार के रिश्ते को बदल दिया। इसने सत्ता के केन्द्रीकरण को चुनौती दी। जनसाधारण के प्रति जवाबदेह और पारदर्शी बनाया। देश भर में इस कानून की सफलता इस रूप में देखी जा सकती है कि हजारों की तादाद में लोग सूचना के अधिकार के लिए आवेदन करने लगे। इसके इस्तेमाल करने वालों को धमकियां मिलने लगीं। कई लोगों की हत्याएं भी की गईँ। आज भी की जाती हैं, जबकि उनकी सुरक्षा का कानून में प्रावधान है। सूचना के अधिकार ने विकेन्द्रीकृत, खुद से विकसित प्रक्रिया, और जनसाधारण की शासन की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी बढ़ाई है।  

जनसुनवाई भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने का एक  प्रभावी माध्यम है। इसे मजदूर किसान शक्ति संगठन ने विकसित किया है। अगर कोई यह महसूस करता है कि सार्वजनिक राशि का दुरूपयोग हुआ है तो वे संबंधित अधिकारियों से पूरा हिसाब देने की मांग करेंगे। कितना पैसा निर्माण सामग्री में खर्च हुआ है और कितना पैसा मजदूरों को भुगतान के रूप में दिया गया है। इस संबंध में राजस्थान सरकार ने जन सूचना पोर्टल बनाकर अच्छी पहल शुरू की है, जिसमें जो शासकीय सूचनाएं पहले उपलब्ध नहीं थी, अब वे आसानी से पोर्टल पर उपलब्ध हैं। जैसे सरकारी कार्यक्रमों और योजनाओं का क्रियान्वन जमीनी स्तर तक कितना हुआ है, कौन लाभार्थी हैं, गांवों में राशन दुकानों से कितने लोगों को राशन मिला। कौन सी खदान की लीज किसको दी गई, कितनी बड़ी खदान है, इत्यादि।

जनसुनवाई में सभी ग्रामीण आमंत्रित होते हैं और वे भी जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। अधिकारी, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता भी इसमें आमंत्रित किए जाते हैं। जिन लोगों पर आरोप हैं, उन्हें उनकी बात रखने का पूरा मौका दिया जाता है।

जनसुनवाई और सूचना के अधिकार भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रभावी कदम साबित हुए हैं। यह लोगों के उनके अधिकारों की रक्षा करने में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने में मददगार साबित हुए हैं। इस दृष्टि से जनसुनवाई और सामाजिक अंकेक्षण का महत्व बढ़ जाता है।

गांधीवादी सुदर्शन आयंगर जनसुनवाई में विचार रखते हुए

मजदूर किसान शक्ति संगठन ने यहां गरीबों के बीच काम किया है, पर इसका असर राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर हुआ है। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी सराहना और बातचीत हुई है। इससे यह भी सीखा जा सकता है कि स्थानीय संघर्ष को राष्ट्रीय स्तर पर कैसे जोड़ा जा सकता है। इसके साथ ही इस संगठन ने देश भर के जनसंगठनों व सामाजिक कार्यकर्ताओं व पत्रकारों को भी इससे जोड़ा है। आम तौर पर कार्यकर्ता जमीन पर तो संघर्ष करते हैं, पर शहरी पढ़े लिखे लोगों को नहीं जोड़ पाते हैं, जो इस संगठन की सफलता है।  सरकार व प्रशासन की योजनाओं का जनसाधारण को कैसे लाभ मिले, उन्हें कैसे पारदर्शी व जवाबदेह बनाया जा सकता है, यह भी जनसुनवाई जैसी प्रक्रियाओं से सीखा जा सकता है। एक और महत्वपूर्ण बात है, सामाजिक कार्यकर्ता और संगठन की कार्यपद्धति की, उनके खुद के जीवन की, बेहद जो सादगीपूर्ण है। आज की तामझाम की जीवनशैली में अत्यंत साधारण है, जो एक आदर्श है, अनुकरणीय है।

लेखक बाबा मायाराम के साथ संपर्क करें




Story Tags: empowerment, employment, labour, women empowerment, workers, right to information, rights, rights of civil society, political, legal, public hearing, landscape, constitution, transparency

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