झारखंड में हथकरघा क्रांति (in Hindi)

By बाबा मायाराम on Jan. 30, 2016 in Livelihoods

Written specially for Vikalp Sangam

झारखंड में चुपचाप मौन क्रांति आ रही है। और यह लघु-कुटीर उद्योगों के माध्यम से आ रही है। जो काम पिछले कई दशकों में नहीं हो पाया, वह कुछ समय में हो गया। इससे न केवल लोगों को रोजगार मिल रहा है, बल्कि उनमें आत्मविश्वास बढ़ रहा है और उनका जीवन बेहतर हो रहा है। हालांकि अभी इसमें कुछ कमी आई है, इस पर उच्च न्यायालय ने चिंता भी जताई है। सरकार से जवाब तलब भी किया गया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि झारखंड सरकार इस ओर ध्यान देगी और इससे जुड़े लोगों की रोजी-रोटी सुनिश्चित करेगी।

झारक्राफ्ट का काम अगस्त 2006 से मामूली स्तर से शुरू हुआ, जो आज झारखंड के कई जिलों में फैल गया है। इससे करीब साढे तीन लाख परिवार जुड़ चुके हैं। उनके जीवन में बदलाव आ गया है। और यह बदलाव झारक्राफ्ट की वजह से संभव हुआ है। पिछले 7-8 सालों में यह काम झारखंड से दुनिया के कई देशों तक पहुंच गया। इसने जमीन पर खड़े होकर आसमान को छू लिया है।

अब गांव- गांव में हथकरघे की खटपट सुनाई देने लगी हैं। मिट्टी की सुंदर मूर्तियां बनाई जा रही हैं। आदिवासी चित्रकला को सामने लाया जा रहा है। बेंत और बांस के सामान बनाए जा रहे हैं। लुप्त होते  हाथ के हुनर को फिर से सशक्त किया जा रहा है। इससे कई जिंदगियों में बदलाव आ रहा है।  जो महिलाएं कभी परिवार की चारदीवारी तक सीमित थी, और आर्थिक रूप से पूरी तरह पति निर्भर थी, अब आर्थिक रूप से सक्षम हो गईं। दूरदराज के इलाकों में साइकिल पर सवार लड़कियों को स्कूल जाते हुए देखना अपने आप में सुखद है। स्थानीय महिलाएं प्रशिक्षण देने के लिए दूर-दूर के विदेशों में स्थित शहरों तक हो आईं।

उरुगुट्टू गाँव में झारक्राफ्ट का हथकरघा, फोटो अशीष कोठारी 

जिन आदिवासियों के घरों की बरसों से मरम्मत नहीं हुई थी, उन्होंने पक्के मकान बना लिए। जिनके बच्चे स्कूल नहीं जा पाते थे, उनके बच्चे स्कूल जाने लगे। जो बुनकर रोजगार के अभाव में पलायन कर चले गए, वे वापस अपने गांव में लौट आए। जो मजदूर कल तक साधारण मजदूरी करते थे, आज प्रशिक्षण और प्रोत्साहन के माध्यम से प्रशिक्षक बन गए।

झारखंड का संदर्भ    

झारखंड की संस्कृति की पहचान का आधार यहां की आदिवासी संस्कृति है। यहां करीब एक तिहाई आदिवासी आबादी है जिसमें करीब 30 आदिवासी समुदाय हैं। आदिवासी स्वभाव से प्रकृतिपूजक हैं। पेड़,पहाड़, नदियां ही इनके देवता हैं। इस प्रदेश की भौगोलिक बनावट सीढ़ीनुमा है। उत्तर या दक्षिण से आने वाले यात्रियों के लिए ये सीढ़ियां अधिक साफ दिखाई देती हैं। उत्तरी सीढ़ियां रजौली घाटी (हजारीबाग), चुटूपालू घाटी (रांची), नेतरहाट (लोहरदगा) को चिन्हित करती हैं तो दक्षिणी सीढियां बावनघाटी (मयूरभंज), टेबो (सिंहभूमि), नेतरहाट (लोहरदगा) की घाटियों को छूती हैं। इन से यहां की समतल, पठारी और वनक्षेत्रों की पहचान होती है। समतल जमीन पर खेती होती है। पठारों पर खनिजों की बहुतायत है और जंगलों में वनोपज है।

झारखंड का जीवन भी इसी के अनुरूप दिखाई देता है। कबीलाई समुदाय, किसान और औद्योगिक नगर हैं । पहाड़ों पर असुर और बिरहोर की आदिमतम जीवन पद्धतियां हैं तो दूसरी ओर रांची, जमशेदपुर, धनबाद-बोकारो औद्योगिक क्षेत्रों में अग्रणी हैं। जबकि समतल भूमि पर खेती की जाती है। यहां एक साथ तीन सभ्यताएं हैं।

प्राकृतिक संसाधनों की बहुतायत के कारण काफी दशकों से यहां खनिजों का दोहन होना शुरू हुआ है। खदान और खनिजों के दोहन के कारण वन कटे और लोगों की पारंपरिक जीवन पद्धति प्रभावित हुई। पारंपरिक रोजगार जो जंगल पर आधारित थे वे कम हुए तो लोगों ने पलायन किया। वे उत्तर बंग से लेकर असम के चाय बागानों तक ले जाए गए। वे यहां कि संस्कृति से कट गए।       

लेकिन इसमें कमी तब आई जब झारक्राफ्ट का काम फैलने लगा। अब तक झारक्राफ्ट के प्रबंध निदेशक रहे धीरेन्द्र कुमार बताते हैं कि जब इस काम की जिम्मेदारी मुझे मिली, हमने नीचे से शुरूआत की। 2006 में झारखंड सरकार के अंतर्गत  झारक्राफ्ट (झारखंड रेशम टेक्सटाइल एवं हथकरघा विकास कारपोरेशन लिमिटेड) का संचालन किया गया। इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार उपलब्ध कराना था। रेशम उत्पादन, हथकरघा और हस्तशिल्प और इससे जुड़ी गतिविधियों के माध्यम से रोजगार का अवसर उपलब्ध करवाना था।

इसमें कच्चा माल उपलब्ध कराने से लेकर, डिजाइनिंग, उत्पाद तैयार करने और मार्केटिंग तक का नेटवर्क बनाया गया। सभी कामों के लिए उपयुक्त व्यक्ति का चयन, जरूरी प्रशिक्षण और संसाधन उपलब्ध कराने से लेकर उसकी निगरानी तक का ढांचा तैयार किया गया। इनमें से ज्यादातर वे पुरुष और महिलाएं हैं, जो गरीबी रेखा से नीचे हैं। झारक्राफ्ट ने रोजगार के नए मौके उपलब्ध कराएं, वह भी स्थानीय संसाधनों के इस्तेमाल से। इसमें उन स्थानीय कारीगरों व संभावनाशील युवाओं को जोड़ने की कोशिश की गई जो अब तक इससे वंचित थे।

तसर रेशम, लाख, साल, बांस, ताड़ आदि के माध्यम से हस्तशिल्प सशक्त हुए। प्राचीन कला डोकरा के तहत देवताओं की मूर्तियां और शो पीस तैयार किए जाने लगे। तांबा और कांसे की ढलाई से यह मूर्तियां तैयार की जाती हैं। इस कला में मल्हार आदिवासी निपुण हैं, उन्हें इस काम में जोड़ा गया। स्वयं सहायता समूह के जरिए इस काम को किया गया। एक समूह में 20 लोग होते थे। इस तरह करीब 20 समूहों ने यह काम किया। तसर रेशम के उत्पादन से लेकर धागा निकालने से लेकर साड़ी बनाने तक के सभी काम ग्रामीण करते हैं।

झारखंड तसर उत्पादन में अग्रणी है। यहां 2013-14 में 2004 मेट्रिक टन तसर का उत्पादन हुआ। बीज बैंक बनाए गए। रेशम दूत बनाए गए जो बीज उत्पादन से लेकर धागा निकालने,रंगाई में मुख्य भूमिका निभाते हैं।

झारखंड की परंपरागत कला है डोकरा। इसे मल्हार आदिवासी करते आ रहे हैं। यह छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी है। इसे बनाने की आदिवासियों की देशज पद्धति है। इसकी करीब 5 सौ डिजाइन आ गई हैं। और हजारीबाग खूंटी, सिंहभूमि पूर्व, रामगढ़ और दुमका जिले में इसे बनाने वालों के संकुल( कलस्टर) बनाए गए हैं।

इसके अलावा, बांस की टोकरी, स्टूल और गुलदस्ते आदि सामान बनाए जा रहे हैं।  लकड़ी, ताड़ के सामान और लाख की चूडियां भी बनाई जाती हैं। जरदोजी का काम भी महिलाएं करती हैं। मिट्टीकला से कई सामान बनाए जा रहे हैं।

यहां की लगभग लुप्त हो चुकी आदिवासी की चित्रकला को फिर से पुनर्जीवित किया जा रहा है। हजारीबाग की सोहराई, कोहबर पेटिंग और पूर्वी सिंहभूमि की पैतकर और दुमका जिले की जादोपटिया पेंटिंग प्रसिद्ध है। जिसमें से जादोपटिया और पैतकर पेटिंग लुप्त हो गई थी जबकि सोहरई और कोहबर को कुछ कलाकर अपना रहे थे। झारक्राफ्ट ने ऐसे कलाकारों को ढूंढ़ निकाला जो इसे जानते थे और इसे बढ़ावा दिया।

इसमें विजय चित्रकार की कहानी बड़ी रोचक है। वह झारखंड के अपने गांव से पश्चिम बंगाल के पुरूलिया धान कटाई के लिए चला गया था। जब उससे झारक्राफ्ट के कार्यकर्ताओं ने संपर्क किया कि आप पैतकर पेंटिंग का काम करिए, तो उसने मना कर दिया क्योंकि वह जानता था कि उसके इस हुनर की कोई कद्र नहीं है। जब उसे मनाया गया और इस काम में लगाया गया तो आज वह बहुत खुश है, उसने कई लोगों को पैतकर पेटिंग भी सिखाई।

पटसन, कागज चमड़े, बेंत आदि का बहुत अच्छा कलात्मक सामान बनाया जाने लगा। आदिवासी गहनें भी बनाए जाने लगे। प्लास्टिक की जगह पत्तों से सुंदर बने दोने-पत्तलों का उपयोग होने लगा। बाजार के लिए जगह-जगह हाट, दुकानें खोली गईं। बड़े महानगरों में दुकानें खुली और यहां तक कि विदेशों में यहां का सामान मिलने लगा। झारक्राफ्ट ने खुद या किसी पार्टनर संस्था के सहयोग से मार्केटिंग का नेटवर्क बनाया।  

महिलाओं को इस काम में प्राथमिकता से जोड़ा गया और उन्होंने इसमें बढ़-चढ़कर भागीदारी भी की। महिलाओं की मासिक आमदनी 4 से 5 हजार तक पहुंच गई। इस पैसे को वे अपनी घर-गृहस्थी सुधारने और बच्चों की पढ़ाई लिखाई में खर्च करने लगे।  

झारक्राफ्ट के पास दस्तकारों, हस्तशिल्पियों, प्रशिक्षकों, डिजाइनर, प्रबंधक, एकाउन्टेंट, मार्केटिंग के जानकारों की अच्छी खासी टीम है। उसके प्रशिक्षण केंद्र हैं, फिनिशिंग यूनिट है। झारक्राफ्ट के माध्यम से राज्य और केन्द्र की कई योजनाओं को अमल में लाया जा रहा है।  

रांची में स्थित झारक्राफ्ट की दूकान, फोटो अशीष कोठारी 

यहां ऐसे कई परिवारों व दंपतियों की सफल कहानियों की भरमार है जिनकी जिंदगी बदल गई। रामगढ़ की मीनादेवी हैं। वह काथा कढ़ाई प्रशिक्षण केंद्र में काम करती थी।  वह एक प्रशिक्षण के लिए चीन भी गई थी। महीने में 4 से 5 हजार रूपए कमा लेती थी। बच्चों को स्कूल पढ़ा रही थी।  

इसी की तरह मुनेरा खातून, बिंदावती, अजमेरी खातून, नवकुमार, मंगारी, चरण हेमरोम आदि की सफल कहानियां हैं। मारांगहातु (कुचाई, सरईकेला- खरसवां जिला) के जोगेन्द्र मुंडा ने बरसों पहले शादी की थी लेकिन आर्थिक अभाव के कारण शादी के रीति रिवाज व भोजन इत्यादि की व्यवस्था नहीं कर पाया था। झारक्राफ्ट के काम के कारण कुछ पैसा हाथ में आया था उसने धूमधाम से रीति-रिवाज की रस्में की और सबको भोजन कराया। इसके अलावा उसने ही अपने गांव के बच्चों के लिए स्कूल खोला, जिसके शिक्षक का वेतन वह खुद देता है।

 गोडडा जिले के भगैया गांव के लोग कहते हैं कि वे पहले महाजन के लिए काम करते थे, जो पूरा पैसा नहीं देता था। इस गांव के शब्बीर बताते हैं कि पहले गांव के लोग पलायन के लिए बाहर चले गए थे जो झारक्राफ्ट का काम शुरू होने के बाद वापस लौट आए। और इसी जिले के जीयाजोरी गांव के लोग पहले कोयला चोरी करते थे, जिसमें जोखिम था और चोर कहलाते थे। अब वे चोरी को छोड़कर झारक्राफ्ट के साथ काम कर रहे हैं।

 जिन लघु-कुटीर उद्योगों को ब्रिटिश जमाने में नेस्तनाबूद किया गया, यह मौका था जब वे फिर से फलने-फूलने लगे। और इसमें बड़ी आबादी को रोजगार से जोड़ा जा रहा है।  

विकास की जो प्रचलित सोच है, उसमें बड़े-बड़े उद्योग, चमचमाते शहर और महंगी व भारी पूंजी वाली खेती और उद्योगों को बढ़ावा दिया जा रहा है। बस आमदनी व मुनाफा बढ़ना चाहिए, जीडीपी बढ़नी चाहिए, यही मूल मंत्र बन गया है। लेकिन हमें अगर लोगों के खानपान, रहन- सहन, पोषण और स्वास्थ्य की स्थिति सुधारनी है तो हमें समग्रता से सोचना होगा।

हमें देखना होगा कि हमारी नीतियां और योजनाओं के कारण गरीब और कमजोर लोगों की स्थिति में सुधार हो। जल, जंगल, जमीन पर उनको अधिकार मिले। ऐसा विकास हो, जिससे विस्थापन न हो या कम से कम विस्थापन हो। खेती-किसानी के संकट को दूर किया जाए। और परंपरागत रोजगारों को फिर से खड़ा किया जाए जिससे लोगों की आजीविका चलती रहे। रोजगार का संकट न रहे।

गांवों के बारे में गांधीजी की सोच आज से भिन्न थी। वे गांवों को स्वावलंबी बनाना चाहते थे। लेकिन अंग्रेजी राज के दिनों में हथकरघा बुनकरों के कार्य को बहुत क्षति हुई क्योंकि विदेशी सरकार ने अपने कारखानों में बने सामान की बिक्री करवाने की और स्थानीय दस्तकारों व बुनकरी की तबाही की नीतियां अपनाईं। इसके पहले भारतीय कारगरों और दस्तकारों की दुनिया में धाक थी।

आजादी के संघर्ष में अपने देश के कारीगरों का बना कपड़ा और खादी व स्वदेशी को काफी महत्व दिया गया। फिर भी स्वतंत्र भारत में भी इसे अनदेखा किया गया। देश में बुनकरी और दस्तकारी में बहुत बड़ा रोजगार था। आज भी इस तरह के हथकरघा बुनकरों और दस्तकारों को बचाने की जरूरत है।

गांधीजी कहते थे कि नई तकनीक व उत्पाद का प्रसार केवल मुनाफे के आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता है। गांधीजी ने सबसे बड़ी कसौटी बताई, वह थी रोजगार की कसौटी। यह सोच आज भी प्रासंगिक हैं।

ग्लोबल वार्मिंग और मौसम बदलाव के इस दौर में एक और बात महत्वपूर्ण है कि किसी भी नए उत्पाद व तकनीक का स्वास्थ्य और पर्यावरण पर क्या असर पड़ रहा है। कारखानों में काम करने वाले मजदूरों को स्वास्थ्य संबंधी परेशानी आम बात है। मशीनों के उपयोग से पर्यावरण पर भी उसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

इसीलिए हमें अपने हस्तकार, हस्तशिल्प और बुनकरों को बचाना और उनके काम को बचाना जरूरी है।  देश में हाथ का कार्य, हुनर बचा रहे तभी गरीबी और बेरोजगारी दूर होगी। गांव में लोगों को रोजगार उपलब्ध हो, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छ पानी की व्यवस्था हो और लोगों को पलायन न करना पड़े। अगर इस दिशा में आगे बढ़ा जाए तो न केवल रोजगार बचेगा बल्कि गांव भी उजड़ने से बचेंगे और देश भी बचेगा। और यह काम काफी हद तक झारक्राफ्ट ने किया भी।

धीरेन्द्र कुमार कहते हैं कि हमने परंपरागत बुनकर समितियों को सशक्त किया लेकिन यह हमेशा चलती रहे, इसे सुनिश्चित किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि कुछ लोग तो बाजार में बिना किसी मदद के टिक जाते हैं। उन्हें हम प्रशिक्षित कर इस काबिल बना देते हैं कि यह काम जारी रख सकें। लेकिन शुरूआत में सरकार की भूमिका होनी चाहिए, जब तक वे अपने पैरों पर खड़े न हो सकें।

वे कहते हैं कि इस पूरे काम में सिर्फ निर्यात और बड़े महानगरों के लिए सामान बनाने पर हमारा जोर नहीं था।  हमने लोगों की स्थानीय जरूरत के हिसाब से भी सामान बनाए। लेकिन इस दिशा में काम ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाया।

लेकिन इस पूरे काम की गति धीमी हो गई है। जिन्होंने यह पौधा रोपा था वह थे अब तक रहे झारखंड के निदेशक धीरेन्द्र कुमार। अब उनकी सेवानिवृत्ति हो गई है। नए डायरेक्टर ने अब तक इस दिशा में कोई खास काम नहीं किया है। बल्कि एक के बाद एक संकुल बंद होते जा रहे हैं। खबर है कि 200 संकुलों में से अधिकांश बंद हो गए हैं। इस पर उच्च न्यायालय ने भी चिंता जताई है। इसके अलावा झारखंड के जागरूक नागरिक भी इससे चिंतित हैं। समाचार पत्रों में भी झारक्राफ्ट की ताजा हालत पर लगातार खबरें आ रही हैं।

यहां एक अफसर की सीमा भी दिखाई देती है। धीरेन्द्र कुमार ने बड़ी लगन, मेहनत और ईमानदारी से काम किया, उनके बाद वह नहीं बढ़ रहा है। इससे यह पता चलता है कि एक अच्छा शासक हो और अच्छे अफसर हों तो सरकार के साथ मिलकर अच्छे, उपयोगी और सार्थक काम हो सकते हैं। हमारे देश में कुछ चमकते अफसर हुए हैं और अब भी हैं, जिन्होंने अच्छे अफसर होने के मॉडल को पेश किया है। लेकिन उनको पूर्णता तभी मिलेगी जब नीतियां और सरकारी ढांचा भी बदलेगा। समाज भी बदलेगा। अपने गांव में बनी चीजें खरीदने का चलन बढ़ेगा तभी व्यापक बदलाव आएगा। फिलहाल, झारखंड में झारक्राफ्ट का मॉडल सराहनीय होने के साथ साथ अनुकरणीय भी है।  



Story Tags: Jharkhand, handicrafts, Traditional Knowledge, Tribals, adviasi craft, adivasi, sustainability, weavers, displacement, community

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